मनोज सिन्हा ने कहा कि सही मायने में देखा जाए तो बनारस एक शब्द नहीं बल्कि भाव है, बनारस मुखर भी है और मौन भी, वह सतह भी है और वह पारित भी है। बनारस अस्तित्व की पगध्वनि है जहाँ सुरों को साधने का अर्थ स्वयं को साधते हुये देखना है।