बसंत पंचमी, ज्ञान पंचमी, श्री पंचमी, मधुमास जैसे नामों से ज्ञात सरस्वती पूजा इस वर्ष 14 फरवरी बुधवार को होगी। इस दिन रवि योग और रेवती नक्षत्र का संयोग बन रहा है, जो अत्यंत शुभकारी है। माघ शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि 13 फरवरी को दोपहर 02.41 बजे से शुरू होगी और 14 फरवरी को दोपहर 12.09 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुकूल बुधवार को ही वीणा वादिनी देवी माता सरस्वती की पूजा-अर्चना विधि-विधान से की जाएगी। सरस्वती पूजा के लिए सुबह 07.01 बजे से दोपहर 12.35 बजे तक शुभ मुहूर्त है। साधक को पूजा के लिए 5 घंटे 35 मिनट का समय मिलेगा। इस दिन अबूझ मुहूर्त रहता है, जो कार्यों की शुरुआत के लिए उत्तम है। उल्लेखनीय है कि सरस्वती पूजा के दिन छोटे बच्चों को अक्षर लिखवाए जाते हैं ताकि मां सरस्वती की कृपा से उन्हें करियर में तरक्की मिले। पढ़ाई या परीक्षा की तैयारी कर रहे युवाओं को इस दिन खासकर देवी सरस्वती की पूजा करनी चाहिए, इससे हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।
अतिशुभकारी योग में होगी इस बार की सरस्वती पूजा
शहर के ज्योतिषाचार्य पंडित धर्मेन्द्र झा ने बताया कि इस वर्ष सरस्वती पूजा के दिन रवि योग और रेवती नक्षत्र का संयोग बन रहा है, यह अत्यंत शुभ और फलदायी है। इस दिन शुभ कार्य आरंभ करने से निश्चित रूप से सफलता प्राप्त होती है। लंबे समय तक शुभ परिणाम मिलते हैं। रवि योग सुबह 10.43 बजे से अगले दिन सुबह 07 बजे तक रहेगा जबकि रेवती नक्षत्र सुबह 10.43 बजे तक रहेगा।
विधिपूर्वक पूजन से मिलते हैं अनेक लाभ
नवादा। विधिपूर्वक पूजन से अनेक लाभ मिलते हैं, जिसका खास ध्यान रखने की जरूरत है। पंडित धर्मेन्द्र झा ने कहा कि बसंत पंचमी के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर पीले या सफेद रंग का वस्त्र पहनें। उसके बाद सरस्वती पूजा का संकल्प लें। पूजा स्थान पर मां सरस्वती की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। मां सरस्वती को गंगाजल से स्नान कराएं। फिर उन्हें पीले वस्त्र पहनाएं। इसके बाद पीले फूल, अक्षत, सफेद चंदन या पीले रंग की रोली, पीला गुलाल, धूप, दीप, गंध आदि अर्पित करें। इस दिन सरस्वती माता को गेंदे के फूल की माला अवश्य पहनाएं। साथ ही पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद सरस्वती वंदना एवं मंत्र से मां सरस्वती की पूजा करें। यथासंभव पूजा के समय सरस्वती कवच का पाठ भी कर सकते हैं। आखिर में हवन कुंड बनाकर हवन सामग्री तैयार कर लें और ओम श्री सरस्वत्यै नमः स्वहा मंत्र की एक माला का जाप करते हुए हवन करें। फिर अंत में खड़े होकर मां सरस्वती की आरती करें।