Friday 05-Dec-2025

बिहार में मतदाता सूची सत्यापन पर उठ रहे सवालों पर लगा विराम,चुनाव आयोग ने दी स्पष्टता

बिहार में मतदाता सूची सत्यापन पर उठ रहे सवालों पर लगा विराम,चुनाव आयोग ने दी स्पष्टता

इंपैक्ट लाइव टीम पटना : बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव 2025 से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर चल रही सियासी बहस और उठ रहे सवालों पर भारत निर्वाचन आयोग  ने स्पष्टता प्रदान कर विराम लगा दिया है। विपक्षी दलों द्वारा इस प्रक्रिया को गुप्त एनआरसी और वोटरों को हटाने की साजिश बताए जाने के बाद आयोग ने स्थिति को साफ करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से संवैधानिक है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची को सटीक और पारदर्शी बनाना है।

चुनाव आयोग ने सोमवार को एक बयान जारी कर कहा कि बिहार में 7.89 करोड़ मतदाताओं में से 4.96 करोड़ मतदाता, जो 1 जनवरी 2003 तक मतदाता सूची में शामिल थे, सत्यापन के लिए अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं होगी। इन मतदाताओं को केवल अपने विवरण की पुष्टि करने और गणना फॉर्म भरने की जरूरत है। शेष मतदाताओं को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए निर्धारित दस्तावेज जमा करने होंगे।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, और मनरेगा जॉब कार्ड जैसे दस्तावेज सत्यापन के लिए मान्य नहीं होंगे। इसके बजाय, मतदाताओं को जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, या अन्य निर्धारित दस्तावेज जैसे माता-पिता के प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने होंगे।मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण 25 जून से 26 जुलाई 2025 तक चलेगा। इस दौरान बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर गणना फॉर्म वितरित और एकत्र करेंगे।यदि कोई मतदाता इस दौरान सत्यापन प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाता, तो उसे 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक फॉर्म-6 और घोषणा पत्र के साथ आवेदन करने का मौका मिलेगा।सत्यापन और दावों-आपत्तियों के निपटारे के बाद अंतिम मतदाता सूची 30 सितंबर 2025 को प्रकाशित होगी।

प्रक्रिया को तेज करने के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, विकास मित्र, जीविका दीदी, और एनसीसी, एनएसएस, और नेहरू युवा केंद्र के स्वयंसेवकों की मदद ली जाएगी।विपक्षी दलों, खासकर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने इस सत्यापन प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। राष्ट्रीय जानता दल ने इसे भाजपा को फायदा पहुंचाने की साजिश करार दिया, जबकि कांग्रेस ने इसे राज्य मशीनरी का दुरुपयोग बताते हुए वंचित समुदायों के मतदाताओं को सूची से हटाने की आशंका जताई। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे एनआरसी से भी खतरनाक बताया और दावा किया कि इसका असली निशाना बंगाल है।

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने भी सवाल उठाया कि पिछले साल जून में सही रही मतदाता सूची इस साल जून में कैसे गलत हो गई। उन्होंने सत्यापन के लिए नियुक्त स्वयंसेवकों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी पहचान सार्वजनिक की जानी चाहिए और वे किसी राजनीतिक संगठन से जुड़े नहीं होने चाहिए।चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत की जा रही है। इसका उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, और गैर-नागरिक मतदाताओं को सूची से हटाना और सभी योग्य मतदाताओं को शामिल करना है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया बिहार में शुरू हुई है और बाद में अन्य राज्यों में लागू होगी।

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