Friday 01-May-2026

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का निधन: ‘दिशोम गुरु’ की विदाई, आदिवासी आंदोलन का एक युग समाप्त

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का निधन: ‘दिशोम गुरु’ की विदाई, आदिवासी आंदोलन का एक युग समाप्त

इंपैक्ट लाइव टीम पटना : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक संरक्षक शिबू सोरेन, जिन्हें ‘दिशोम गुरु’ के नाम से जाना जाता था, का सोमवार सुबह 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में अंतिम सांस ली, जहां वे डेढ़ महीने से अधिक समय से किडनी संबंधी बीमारी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भर्ती थे। उनके बेटे और वर्तमान झारखंड मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसकी पुष्टि करते हुए लिखा, “आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूँ…”शिबू सोरेन को जून 2025 के अंतिम सप्ताह में किडनी से संबंधित गंभीर समस्या के कारण दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल के बयान के अनुसार, वे लंबे समय से क्रोनिक किडनी रोग, डायबिटीज और हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। डेढ़ महीने पहले उन्हें ब्रेन स्ट्रोक भी हुआ था, जिसके बाद उनकी स्थिति और गंभीर हो गई। पिछले एक महीने से वे वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे और डायलिसिस के दौर से गुजर रहे थे। अस्पताल ने बताया कि 4 अगस्त 2025 को सुबह 8:56 बजे उनका निधन हो गया। उनके परिवार, जिसमें उनकी पत्नी कल्पना सोरेन और बेटे हेमंत सोरेन शामिल थे, अंतिम समय में उनके साथ थे।11 जनवरी 1944 को अविभाजित बिहार के रामगढ़ जिले (वर्तमान झारखंड) के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन संथाल आदिवासी समुदाय से थे। उनके पिता, एक किसान, की हत्या तब हुई जब शिबू युवा थे, जिसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़कर लकड़ी का व्यापार शुरू किया। 18 साल की उम्र में उन्होंने संथाल नवयुवक संघ की स्थापना की और 1972 में बिनोद बिहारी महतो और एके रॉय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव रखी। वे पार्टी के महासचिव बने और बाद में 1987 में इसके अध्यक्ष बने।

शिबू सोरेन ने आदिवासियों के हक और जमीन के लिए लंबा संघर्ष किया। 1970 के दशक में उन्होंने साहूकारों और जमींदारों के खिलाफ ‘धनकटनी आंदोलन’ चलाया, जिसके तहत आदिवासियों ने अपनी जमीनों पर जबरन फसल कटाई शुरू की। उनकी अगुवाई में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अलग झारखंड राज्य की मांग को तेज किया, जो 2000 में पूरी हुई। सोरेन को झारखंड आंदोलन का जनक माना जाता है।वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे: 2005 में 10 दिन (2 मार्च से 11 मार्च), 2008-2009, और 2009-2010। इसके अलावा, वे 1980, 1989, 1991, 1996, 2004 और 2014 में दुमका से लोकसभा सांसद चुने गए और दो बार राज्यसभा सांसद रहे। उन्होंने यूपीए सरकार में 2004, 2004-2005 और 2006 में कोयला मंत्री के रूप में भी कार्य किया।

शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन विवादों से भी घिरा रहा। 1974 में एक बकरी वध विवाद और 1975 में चिरुडीह नरसंहार में उनकी कथित संलिप्तता के लिए उन पर हत्या के मुकदमे दर्ज हुए, लेकिन 2008 और 2010 में वे इनसे बरी हो गए। 1994 में उनके निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के मामले में 2006 में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, लेकिन 2007 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। इसके अलावा, उन पर अनुपातहीन संपत्ति के भी आरोप लगे।दिशोम गुरु के नाम से मशहूर शिबू सोरेन आदिवासियों के लिए एक प्रतीक थे। उन्होंने साहूकारों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और आदिवासी पहचान को मजबूत किया। उनके नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने न केवल आदिवासियों, बल्कि खनन क्षेत्र के मजदूरों का समर्थन भी हासिल किया। उनके निधन को झारखंड की राजनीति और आदिवासी आंदोलन के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।शिबू सोरेन के निधन पर देशभर के नेताओं ने शोक व्यक्त किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा, शिबू सोरेन का निधन सामाजिक न्याय के क्षेत्र में बड़ा नुकसान है। उन्होंने आदिवासी पहचान और झारखंड राज्य के गठन के लिए लंबा संघर्ष किया।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, शिबू सोरेन जी एक जमीनी नेता थे, जिन्होंने आदिवासियों और वंचितों के उत्थान के लिए जीवन समर्पित किया।कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा और आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव ने भी उनके निधन को आदिवासी राजनीति के लिए बड़ी क्षति बताया।

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