Sunday 14-Dec-2025

बिहार मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई,पूर्ण संरक्षण की मांग

बिहार मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई,पूर्ण संरक्षण की मांग

इम्पैक्ट लाइव टीम पटना : बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा दायर याचिकाओं में इस प्रक्रिया को असंवैधानिक और मतदाताओं के अधिकारों का हनन बताते हुए इसे रद्द करने की मांग की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं और चुनाव आयोग से प्रक्रिया की समयबद्धता और दस्तावेज़ों की वैधता पर सवाल उठाए।

बिहार में विधानसभा चुनाव अक्टूबर-नवंबर 2025 में प्रस्तावित हैं। इसके पहले, चुनाव आयोग ने 25 जून 2025 से बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की शुरुआत की। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची से गैर-नागरिकों और डुप्लिकेट प्रविष्टियों को हटाना था। हालांकि, विपक्षी दलों, जैसे कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल , तृणमूल कांग्रेस, और अन्य, ने इस प्रक्रिया को मनमाना और चुनावी धांधली का प्रयास करार दिया।विपक्ष का दावा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया मतदाताओं पर अनुचित दस्तावेज़ीकरण का बोझ डालती है, जिससे लाखों लोग मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को स्वीकार्य दस्तावेज़ों की सूची से बाहर रखा गया है, जो प्रक्रिया को जटिल बनाता है।यह प्रक्रिया चुनाव से ठीक पहले शुरू की गई, जिसकी समयबद्धता पर सवाल उठ रहे हैं।इसके विरोध में, 9 जुलाई 2025 को महागठबंधन ने बिहार बंद का आह्वान किया, जिसमें कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी हिस्सा लिया।सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की अवकाशकालीन पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, और अन्य मौजूद रहे , जबकि चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी और पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने पक्ष रखा।कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची से गैर-नागरिकों को हटाने की प्रक्रिया में तर्क और व्यावहारिकता है, और इसे कृत्रिम या काल्पनिक नहीं कहा जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने प्रक्रिया की समयबद्धता पर सवाल उठाया, पूछा कि यदि यह करना था, तो पहले क्यों नहीं किया गया? चुनाव से ठीक पहले यह प्रक्रिया शुरू करना उचित नहीं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गैर-नागरिकों को मतदाता सूची से हटाने का अधिकार गृह मंत्रालय का है, न कि चुनाव आयोग का।याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया में केवल 11 दस्तावेज़ स्वीकार किए जा रहे हैं, और आधार कार्ड व मतदाता पहचान पत्र को शामिल न करना अनुचित है। कोर्ट ने इस पर जवाब माँगा, पूछा कि क्यों आधार कार्ड को बाहर रखा गया?चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत अनिवार्य है, और यह प्रक्रिया 2003 में भी की गई थी। आयोग ने कहा कि बिहार में 7.9 करोड़ मतदाताओं में से 57% से अधिक ने नए गणना फॉर्म जमा किए हैं, जिनकी जाँच चल रही है।आयोग ने याचिकाओं को असमय बताते हुए कहा कि अंतिम मतदाता सूची तैयार होने से पहले इन पर सुनवाई उचित नहीं। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे यह साबित करें कि आयोग की प्रक्रिया गलत है।जस्टिस धूलिया ने पूछा, यदि प्रतिनिधित्व जनता अधिनियम के तहत विशेष पुनरीक्षण में मौखिक सुनवाई की आवश्यकता है, तो क्या गहन पुनरीक्षण में यह प्रक्रिया अनिवार्य नहीं होनी चाहिए?

चुनाव आयोग ने अपने बचाव में कहा

•  विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया संविधान के तहत वैध है और इसका उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है।

•  बिहार में पिछले 20 वर्षों में बड़े पैमाने पर प्रविष्टियाँ और हटाने के कारण डुप्लिकेट नाम बढ़ गए हैं।

•  यह प्रक्रिया समावेशी है, और 15 दिनों में 4.53 करोड़ लोगों ने फॉर्म जमा किए हैं।

•  आधार और मतदाता पहचान पत्र को शामिल न करने का निर्णय प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे अपनी आपत्तियों को और स्पष्ट करें और आयोग की प्रक्रिया में खामियों को साबित करें। आयोग ने कोर्ट से अनुरोध किया कि अंतिम मतदाता सूची तैयार होने तक प्रक्रिया को रोका न जाए। सुनवाई अभी जारी है, और अगली तारीख जल्द घोषित की जा सकती है।

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